Rigveda Sukta
Rigveda Mandala 9 Sukta 107

Reading Guide
About RV 9.107
This Sukta has 26 mantras attributed to | translator = and addressed to ऋषयः - सप्तर्षयः (१ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः, २ कश्यपो मारीचः, ३ गोतमो राहूगणः, ४ भौमोऽत्रिः, ५ विश्वामित्रो गाथिनः, ६ जमदग्निर्भार्गवः, ७ मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः). The page keeps the Sanskrit text source-reviewed, then presents original study notes separately so the mantra text and the explanatory layer remain easy to distinguish.
Quick Facts
Original Study Translation
Study Meaning
This Sukta invokes Mitra-Varuna through the Bharadvaja tradition with 26 mantras. The study focus is simple: the seeker asks the divine presence to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker, while keeping speech, yajna, and daily action aligned with rita.
Original Study Translation
Hindi Bhavarth
यह सूक्त भरद्वाज परंपरा में मित्र-वरुण का 26 मंत्रों वाला आह्वान है। सरल अध्ययन-भाव यह है कि साधक देवशक्ति से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना करता है, ताकि वाणी, यज्ञ और दैनिक कर्म ऋत के साथ जुड़े रहें।
RV 9.107.1
Mantra 1
परीतो षिञ्चता सुतं सोमो य उत्तमं हविः । दधन्वाँ यो नर्यो अप्स्वन्तरा सुषाव सोममद्रिभिः ॥१॥
Meaning
With “परीतो षिञ्चता सुतं सोमो य उत्तमं हविः”, the seeker prays to Mitra-Varuna to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 9.107.1 adds one step to the Sukta's movement, keeping the link between outer ritual and inner attention tied to yajna and the invoked presence of ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः).
Hindi Meaning
यहाँ “परीतो षिञ्चता सुतं सोमो य उत्तमं हविः” के माध्यम से मित्र-वरुण से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। मंत्र बाहरी अर्पण और भीतर की जागृति को साथ-साथ रखता है।
Simple Explanation
RV 9.107.1 सूक्त की गति में एक और चरण जोड़ता है, जहाँ बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) के यज्ञ-संस्कार के साथ जुड़ा रहता है।
RV 9.107.2
Mantra 2
नूनं पुनानोऽविभिः परि स्रवादब्धः सुरभिन्तरः । सुते चित्त्वाप्सु मदामो अन्धसा श्रीणन्तो गोभिरुत्तरम् ॥२॥
Meaning
Here, through “नूनं पुनानोऽविभिः परि स्रवादब्धः सुरभिन्तरः”, the seeker prays to Mitra-Varuna to grant nourishment, strength, insight, and useful prosperity. Prosperity is understood here as nourishment, capacity, and meaningful support.
Study Note
RV 9.107.2 is simple but layered: it speaks as prayer to कश्यपो मारीचः, ritual utterance, and reflection on nourishment, strength, and useful prosperity.
Hindi Meaning
पाठ के क्रम में “नूनं पुनानोऽविभिः परि स्रवादब्धः सुरभिन्तरः” के माध्यम से मित्र-वरुण से रयि, वाज, बुद्धि और जीवनोपयोगी संपदा प्रदान करने की प्रार्थना है। यहाँ संपदा को केवल वस्तु नहीं, बल्कि पोषण और क्षमता माना गया है।
Simple Explanation
RV 9.107.2 में कश्यपो मारीचः की स्तुति के भीतर अर्थ का केंद्र पोषण, शक्ति और उपयोगी संपन्नता है। इसलिए पाठक इसे कर्मकांड के साथ-साथ आंतरिक सजगता के संकेत के रूप में भी पढ़ सकता है।
RV 9.107.3
Mantra 3
परि सुवानश्चक्षसे देवमादनः क्रतुरिन्दुर्विचक्षणः ॥३॥
Meaning
Read in context, through “परि सुवानश्चक्षसे देवमादनः क्रतुरिन्दुर्विचक्षणः”, the seeker prays to Mitra-Varuna to illumine intelligence, right order, and disciplined action. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 9.107.3 keeps the link between outer ritual and inner attention connected with the worship of गोतमो राहूगणः. The focus remains on the hymn's ritual and devotional setting.
Hindi Meaning
भाव की दृष्टि से “परि सुवानश्चक्षसे देवमादनः क्रतुरिन्दुर्विचक्षणः” के माध्यम से मित्र-वरुण से बुद्धि, ऋत और सही कर्म-शक्ति को प्रकाशित करने की प्रार्थना है। इसमें बाहरी विधि और भीतर की सजगता, दोनों जुड़े हैं।
Simple Explanation
RV 9.107.3 में गोतमो राहूगणः की स्तुति बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध को सामने लाती है। इसे यज्ञ और साधना, दोनों संदर्भों में पढ़ा जा सकता है।
RV 9.107.4
Mantra 4
पुनानः सोम धारयापो वसानो अर्षसि । आ रत्नधा योनिमृतस्य सीदस्युत्सो देव हिरण्ययः ॥४॥
Meaning
Through “पुनानः सोम धारयापो वसानो अर्षसि”, the seeker prays to Mitra-Varuna to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 9.107.4 should be read as part of Sukta 107's sequence. Its main emphasis is the link between outer ritual and inner attention, expressed through praise of भौमोऽत्रिः.
Hindi Meaning
“पुनानः सोम धारयापो वसानो अर्षसि” के माध्यम से मित्र-वरुण से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। भाव केवल बाहरी क्रिया तक सीमित नहीं रहता; भीतर की जागरूकता भी साथ आती है।
Simple Explanation
RV 9.107.4 का भाव बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध पर टिका है। भौमोऽत्रिः का आह्वान यहाँ केवल नाम-स्मरण नहीं, बल्कि सजग प्रार्थना का रूप लेता है।
RV 9.107.5
Mantra 5
दुहान ऊधर्दिव्यं मधु प्रियं प्रत्नं सधस्थमासदत् । आपृच्छ्यं धरुणं वाज्यर्षति नृभिर्धूतो विचक्षणः ॥५॥
Meaning
In “दुहान ऊधर्दिव्यं मधु प्रियं प्रत्नं सधस्थमासदत्”, the seeker prays to Mitra-Varuna to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. Prosperity is understood here as nourishment, capacity, and meaningful support.
Study Note
In RV 9.107.5, sacred speech, offering, and nourishment, strength, and useful prosperity stay together. This keeps the reading grounded in the verse and in the praise of विश्वामित्रो गाथिनः.
Hindi Meaning
इस मंत्र में “दुहान ऊधर्दिव्यं मधु प्रियं प्रत्नं सधस्थमासदत्” के माध्यम से मित्र-वरुण से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। यहाँ संपदा को केवल वस्तु नहीं, बल्कि पोषण और क्षमता माना गया है।
Simple Explanation
RV 9.107.5 में विश्वामित्रो गाथिनः की ओर उठी वाणी पोषण, शक्ति और उपयोगी संपन्नता को आहुति के साथ समझने में मदद करती है। इसी से मंत्र का भाव स्थिर रहता है।
RV 9.107.6
Mantra 6
पुनानः सोम जागृविरव्यो वारे परि प्रियः । त्वं विप्रो अभवोऽङ्गिरस्तमो मध्वा यज्ञं मिमिक्ष नः ॥६॥
Meaning
With “पुनानः सोम जागृविरव्यो वारे परि प्रियः”, the seeker prays to Mitra-Varuna to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. Agni is understood here as the bridge between the seeker and the devas.
Study Note
RV 9.107.6 adds one step to the Sukta's movement, keeping the movement between offering and divine response tied to yajna and the invoked presence of जमदग्निर्भार्गवः.
Hindi Meaning
यहाँ “पुनानः सोम जागृविरव्यो वारे परि प्रियः” के माध्यम से मित्र-वरुण से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। यहाँ अग्नि साधक और देवता के बीच सेतु की तरह समझी गई है।
Simple Explanation
RV 9.107.6 सूक्त की गति में एक और चरण जोड़ता है, जहाँ आहुति और देव-संबंध के बीच की गति जमदग्निर्भार्गवः के यज्ञ-संस्कार के साथ जुड़ा रहता है।
RV 9.107.7
Mantra 7
सोमो मीढ्वान्पवते गातुवित्तम ऋषिर्विप्रो विचक्षणः । त्वं कविरभवो देववीतम आ सूर्यं रोहयो दिवि ॥७॥
Meaning
Here, through “सोमो मीढ्वान्पवते गातुवित्तम ऋषिर्विप्रो विचक्षणः”, the seeker prays to Mitra-Varuna to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 9.107.7 is simple but layered: it speaks as prayer to मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः), ritual utterance, and reflection on the link between outer ritual and inner attention.
Hindi Meaning
पाठ के क्रम में “सोमो मीढ्वान्पवते गातुवित्तम ऋषिर्विप्रो विचक्षणः” के माध्यम से मित्र-वरुण से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। इस पाठ में कर्म और चेतना, दोनों का संतुलन दिखाई देता है।
Simple Explanation
RV 9.107.7 में मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) की स्तुति के भीतर अर्थ का केंद्र बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध है। इसलिए पाठक इसे कर्मकांड के साथ-साथ आंतरिक सजगता के संकेत के रूप में भी पढ़ सकता है।
RV 9.107.8
Mantra 8
सोम उ षुवाणः सोतृभिरधि ष्णुभिरवीनाम् । अश्वयेव हरिता याति धारया मन्द्रया याति धारया ॥८॥
Meaning
Read in context, through “सोम उ षुवाणः सोतृभिरधि ष्णुभिरवीनाम्”, the seeker prays to Mitra-Varuna to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 9.107.8 keeps the link between outer ritual and inner attention connected with the worship of ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः). The focus remains on the hymn's ritual and devotional setting.
Hindi Meaning
भाव की दृष्टि से “सोम उ षुवाणः सोतृभिरधि ष्णुभिरवीनाम्” के माध्यम से मित्र-वरुण से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। इसमें बाहरी विधि और भीतर की सजगता, दोनों जुड़े हैं।
Simple Explanation
RV 9.107.8 में ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) की स्तुति बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध को सामने लाती है। इसे यज्ञ और साधना, दोनों संदर्भों में पढ़ा जा सकता है।
RV 9.107.9
Mantra 9
अनूपे गोमान्गोभिरक्षाः सोमो दुग्धाभिरक्षाः । समुद्रं न संवरणान्यग्मन्मन्दी मदाय तोशते ॥९॥
Meaning
Through “अनूपे गोमान्गोभिरक्षाः सोमो दुग्धाभिरक्षाः”, the seeker prays to Mitra-Varuna to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. Prosperity is understood here as nourishment, capacity, and meaningful support.
Study Note
RV 9.107.9 should be read as part of Sukta 107's sequence. Its main emphasis is nourishment, strength, and useful prosperity, expressed through praise of ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः).
Hindi Meaning
“अनूपे गोमान्गोभिरक्षाः सोमो दुग्धाभिरक्षाः” के माध्यम से मित्र-वरुण से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। यहाँ संपदा को केवल वस्तु नहीं, बल्कि पोषण और क्षमता माना गया है।
Simple Explanation
RV 9.107.9 का भाव पोषण, शक्ति और उपयोगी संपन्नता पर टिका है। ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) का आह्वान यहाँ केवल नाम-स्मरण नहीं, बल्कि सजग प्रार्थना का रूप लेता है।
RV 9.107.10
Mantra 10
आ सोम सुवानो अद्रिभिस्तिरो वाराण्यव्यया । जनो न पुरि चम्वोर्विशद्धरिः सदो वनेषु दधिषे ॥१०॥
Meaning
In “आ सोम सुवानो अद्रिभिस्तिरो वाराण्यव्यया”, the seeker prays to Mitra-Varuna to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
In RV 9.107.10, sacred speech, offering, and the link between outer ritual and inner attention stay together. This keeps the reading grounded in the verse and in the praise of ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः).
Hindi Meaning
इस मंत्र में “आ सोम सुवानो अद्रिभिस्तिरो वाराण्यव्यया” के माध्यम से मित्र-वरुण से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। यहाँ यज्ञ की बाहरी रचना के साथ अंतर्मन की सावधानी भी महत्व रखती है।
Simple Explanation
RV 9.107.10 में ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) की ओर उठी वाणी बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध को आहुति के साथ समझने में मदद करती है। इसी से मंत्र का भाव स्थिर रहता है।
RV 9.107.11
Mantra 11
स मामृजे तिरो अण्वानि मेष्यो मीळ्हे सप्तिर्न वाजयुः । अनुमाद्यः पवमानो मनीषिभिः सोमो विप्रेभिरृक्वभिः ॥११॥
Meaning
With “स मामृजे तिरो अण्वानि मेष्यो मीळ्हे सप्तिर्न वाजयुः”, the seeker prays to Mitra-Varuna to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. Prosperity is understood here as nourishment, capacity, and meaningful support.
Study Note
RV 9.107.11 adds one step to the Sukta's movement, keeping nourishment, strength, and useful prosperity tied to yajna and the invoked presence of ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः).
Hindi Meaning
यहाँ “स मामृजे तिरो अण्वानि मेष्यो मीळ्हे सप्तिर्न वाजयुः” के माध्यम से मित्र-वरुण से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। यहाँ संपदा को केवल वस्तु नहीं, बल्कि पोषण और क्षमता माना गया है।
Simple Explanation
RV 9.107.11 सूक्त की गति में एक और चरण जोड़ता है, जहाँ पोषण, शक्ति और उपयोगी संपन्नता ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) के यज्ञ-संस्कार के साथ जुड़ा रहता है।
RV 9.107.12
Mantra 12
प्र सोम देववीतये सिन्धुर्न पिप्ये अर्णसा । अंशोः पयसा मदिरो न जागृविरच्छा कोशं मधुश्चुतम् ॥१२॥
Meaning
Here, through “प्र सोम देववीतये सिन्धुर्न पिप्ये अर्णसा”, the seeker prays to Mitra-Varuna to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 9.107.12 is simple but layered: it speaks as prayer to ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः), ritual utterance, and reflection on the link between outer ritual and inner attention.
Hindi Meaning
पाठ के क्रम में “प्र सोम देववीतये सिन्धुर्न पिप्ये अर्णसा” के माध्यम से मित्र-वरुण से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। इस पाठ में कर्म और चेतना, दोनों का संतुलन दिखाई देता है।
Simple Explanation
RV 9.107.12 में ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) की स्तुति के भीतर अर्थ का केंद्र बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध है। इसलिए पाठक इसे कर्मकांड के साथ-साथ आंतरिक सजगता के संकेत के रूप में भी पढ़ सकता है।
RV 9.107.13
Mantra 13
आ हर्यतो अर्जुने अत्के अव्यत प्रियः सूनुर्न मर्ज्यः । तमीं हिन्वन्त्यपसो यथा रथं नदीष्वा गभस्त्योः ॥१३॥
Meaning
Read in context, through “आ हर्यतो अर्जुने अत्के अव्यत प्रियः सूनुर्न मर्ज्यः”, the seeker prays to Mitra-Varuna to give protection, auspiciousness, and well-being. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 9.107.13 keeps the link between outer ritual and inner attention connected with the worship of ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः). The focus remains on the hymn's ritual and devotional setting.
Hindi Meaning
भाव की दृष्टि से “आ हर्यतो अर्जुने अत्के अव्यत प्रियः सूनुर्न मर्ज्यः” के माध्यम से मित्र-वरुण से रक्षा, शुभता और स्वस्ति देने की प्रार्थना है। इसमें बाहरी विधि और भीतर की सजगता, दोनों जुड़े हैं।
Simple Explanation
RV 9.107.13 में ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) की स्तुति बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध को सामने लाती है। इसे यज्ञ और साधना, दोनों संदर्भों में पढ़ा जा सकता है।
RV 9.107.14
Mantra 14
अभि सोमास आयवः पवन्ते मद्यं मदम् । समुद्रस्याधि विष्टपि मनीषिणो मत्सरासः स्वर्विदः ॥१४॥
Meaning
Through “अभि सोमास आयवः पवन्ते मद्यं मदम्”, the seeker prays to Mitra-Varuna to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 9.107.14 should be read as part of Sukta 107's sequence. Its main emphasis is the link between outer ritual and inner attention, expressed through praise of ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः).
Hindi Meaning
“अभि सोमास आयवः पवन्ते मद्यं मदम्” के माध्यम से मित्र-वरुण से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। भाव केवल बाहरी क्रिया तक सीमित नहीं रहता; भीतर की जागरूकता भी साथ आती है।
Simple Explanation
RV 9.107.14 का भाव बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध पर टिका है। ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) का आह्वान यहाँ केवल नाम-स्मरण नहीं, बल्कि सजग प्रार्थना का रूप लेता है।
RV 9.107.15
Mantra 15
तरत्समुद्रं पवमान ऊर्मिणा राजा देव ऋतं बृहत् । अर्षन्मित्रस्य वरुणस्य धर्मणा प्र हिन्वान ऋतं बृहत् ॥१५॥
Meaning
In “तरत्समुद्रं पवमान ऊर्मिणा राजा देव ऋतं बृहत्”, the seeker prays to Mitra-Varuna to illumine intelligence, right order, and disciplined action. The emphasis here is truth, discipline, and life aligned with rita.
Study Note
In RV 9.107.15, sacred speech, offering, and rita, truth, and disciplined order stay together. This keeps the reading grounded in the verse and in the praise of ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः).
Hindi Meaning
इस मंत्र में “तरत्समुद्रं पवमान ऊर्मिणा राजा देव ऋतं बृहत्” के माध्यम से मित्र-वरुण से बुद्धि, ऋत और सही कर्म-शक्ति को प्रकाशित करने की प्रार्थना है। यहाँ सत्य, नियम और ऋत-आधारित जीवन पर बल है।
Simple Explanation
RV 9.107.15 में ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) की ओर उठी वाणी ऋत, सत्य और अनुशासित व्यवस्था को आहुति के साथ समझने में मदद करती है। इसी से मंत्र का भाव स्थिर रहता है।
RV 9.107.16
Mantra 16
नृभिर्येमानो हर्यतो विचक्षणो राजा देवः समुद्रियः ॥१६॥
Meaning
With “नृभिर्येमानो हर्यतो विचक्षणो राजा देवः समुद्रियः”, the seeker prays to Mitra-Varuna to awaken balanced strength and auspicious inspiration in the seeker’s life. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 9.107.16 adds one step to the Sukta's movement, keeping the link between outer ritual and inner attention tied to yajna and the invoked presence of ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः).
Hindi Meaning
यहाँ “नृभिर्येमानो हर्यतो विचक्षणो राजा देवः समुद्रियः” के माध्यम से मित्र-वरुण से साधक के जीवन में शुभ प्रेरणा और संतुलित शक्ति जगाने की प्रार्थना है। मंत्र बाहरी अर्पण और भीतर की जागृति को साथ-साथ रखता है।
Simple Explanation
RV 9.107.16 सूक्त की गति में एक और चरण जोड़ता है, जहाँ बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) के यज्ञ-संस्कार के साथ जुड़ा रहता है।
RV 9.107.17
Mantra 17
इन्द्राय पवते मदः सोमो मरुत्वते सुतः । सहस्रधारो अत्यव्यमर्षति तमी मृजन्त्यायवः ॥१७॥
Meaning
Here, through “इन्द्राय पवते मदः सोमो मरुत्वते सुतः”, the seeker prays to Mitra-Varuna to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. Indra represents inner strength, courage, and victory over obstruction.
Study Note
RV 9.107.17 is simple but layered: it speaks as prayer to ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः), ritual utterance, and reflection on courage, strength, and the removal of obstruction.
Hindi Meaning
पाठ के क्रम में “इन्द्राय पवते मदः सोमो मरुत्वते सुतः” के माध्यम से मित्र-वरुण से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। यहाँ इन्द्र आंतरिक बल, साहस और अवरोध-विजय के प्रतीक हैं।
Simple Explanation
RV 9.107.17 में ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) की स्तुति के भीतर अर्थ का केंद्र साहस, बल और अवरोध-विजय है। इसलिए पाठक इसे कर्मकांड के साथ-साथ आंतरिक सजगता के संकेत के रूप में भी पढ़ सकता है।
RV 9.107.18
Mantra 18
पुनानश्चमू जनयन्मतिं कविः सोमो देवेषु रण्यति । अपो वसानः परि गोभिरुत्तरः सीदन्वनेष्वव्यत ॥१८॥
Meaning
Read in context, through “पुनानश्चमू जनयन्मतिं कविः सोमो देवेषु रण्यति”, the seeker prays to Mitra-Varuna to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. Prosperity is understood here as nourishment, capacity, and meaningful support.
Study Note
RV 9.107.18 keeps nourishment, strength, and useful prosperity connected with the worship of ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः). The focus remains on the hymn's ritual and devotional setting.
Hindi Meaning
भाव की दृष्टि से “पुनानश्चमू जनयन्मतिं कविः सोमो देवेषु रण्यति” के माध्यम से मित्र-वरुण से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। यहाँ संपदा को केवल वस्तु नहीं, बल्कि पोषण और क्षमता माना गया है।
Simple Explanation
RV 9.107.18 में ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) की स्तुति पोषण, शक्ति और उपयोगी संपन्नता को सामने लाती है। इसे यज्ञ और साधना, दोनों संदर्भों में पढ़ा जा सकता है।
RV 9.107.19
Mantra 19
तवाहं सोम रारण सख्य इन्दो दिवेदिवे । पुरूणि बभ्रो नि चरन्ति मामव परिधीँरति ताँ इहि ॥१९॥
Meaning
Through “तवाहं सोम रारण सख्य इन्दो दिवेदिवे”, the seeker prays to Mitra-Varuna to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 9.107.19 should be read as part of Sukta 107's sequence. Its main emphasis is the link between outer ritual and inner attention, expressed through praise of ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः).
Hindi Meaning
“तवाहं सोम रारण सख्य इन्दो दिवेदिवे” के माध्यम से मित्र-वरुण से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। भाव केवल बाहरी क्रिया तक सीमित नहीं रहता; भीतर की जागरूकता भी साथ आती है।
Simple Explanation
RV 9.107.19 का भाव बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध पर टिका है। ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) का आह्वान यहाँ केवल नाम-स्मरण नहीं, बल्कि सजग प्रार्थना का रूप लेता है।
RV 9.107.20
Mantra 20
उताहं नक्तमुत सोम ते दिवा सख्याय बभ्र ऊधनि । घृणा तपन्तमति सूर्यं परः शकुना इव पप्तिम ॥२०॥
Meaning
In “उताहं नक्तमुत सोम ते दिवा सख्याय बभ्र ऊधनि”, the seeker prays to Mitra-Varuna to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
In RV 9.107.20, sacred speech, offering, and the link between outer ritual and inner attention stay together. This keeps the reading grounded in the verse and in the praise of ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः).
Hindi Meaning
इस मंत्र में “उताहं नक्तमुत सोम ते दिवा सख्याय बभ्र ऊधनि” के माध्यम से मित्र-वरुण से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। यहाँ यज्ञ की बाहरी रचना के साथ अंतर्मन की सावधानी भी महत्व रखती है।
Simple Explanation
RV 9.107.20 में ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) की ओर उठी वाणी बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध को आहुति के साथ समझने में मदद करती है। इसी से मंत्र का भाव स्थिर रहता है।
RV 9.107.21
Mantra 21
मृज्यमानः सुहस्त्य समुद्रे वाचमिन्वसि । रयिं पिशङ्गं बहुलं पुरुस्पृहं पवमानाभ्यर्षसि ॥२१॥
Meaning
With “मृज्यमानः सुहस्त्य समुद्रे वाचमिन्वसि”, the seeker prays to Mitra-Varuna to grant nourishment, strength, insight, and useful prosperity. Prosperity is understood here as nourishment, capacity, and meaningful support.
Study Note
RV 9.107.21 adds one step to the Sukta's movement, keeping nourishment, strength, and useful prosperity tied to yajna and the invoked presence of ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः).
Hindi Meaning
यहाँ “मृज्यमानः सुहस्त्य समुद्रे वाचमिन्वसि” के माध्यम से मित्र-वरुण से रयि, वाज, बुद्धि और जीवनोपयोगी संपदा प्रदान करने की प्रार्थना है। यहाँ संपदा को केवल वस्तु नहीं, बल्कि पोषण और क्षमता माना गया है।
Simple Explanation
RV 9.107.21 सूक्त की गति में एक और चरण जोड़ता है, जहाँ पोषण, शक्ति और उपयोगी संपन्नता ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) के यज्ञ-संस्कार के साथ जुड़ा रहता है।
RV 9.107.22
Mantra 22
मृजानो वारे पवमानो अव्यये वृषाव चक्रदो वने । देवानां सोम पवमान निष्कृतं गोभिरञ्जानो अर्षसि ॥२२॥
Meaning
Here, through “मृजानो वारे पवमानो अव्यये वृषाव चक्रदो वने”, the seeker prays to Mitra-Varuna to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. Prosperity is understood here as nourishment, capacity, and meaningful support.
Study Note
RV 9.107.22 is simple but layered: it speaks as prayer to ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः), ritual utterance, and reflection on nourishment, strength, and useful prosperity.
Hindi Meaning
पाठ के क्रम में “मृजानो वारे पवमानो अव्यये वृषाव चक्रदो वने” के माध्यम से मित्र-वरुण से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। यहाँ संपदा को केवल वस्तु नहीं, बल्कि पोषण और क्षमता माना गया है।
Simple Explanation
RV 9.107.22 में ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) की स्तुति के भीतर अर्थ का केंद्र पोषण, शक्ति और उपयोगी संपन्नता है। इसलिए पाठक इसे कर्मकांड के साथ-साथ आंतरिक सजगता के संकेत के रूप में भी पढ़ सकता है।
RV 9.107.23
Mantra 23
पवस्व वाजसातयेऽभि विश्वानि काव्या । त्वं समुद्रं प्रथमो वि धारयो देवेभ्यः सोम मत्सरः ॥२३॥
Meaning
Read in context, through “पवस्व वाजसातयेऽभि विश्वानि काव्या”, the seeker prays to Mitra-Varuna to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. Prosperity is understood here as nourishment, capacity, and meaningful support.
Study Note
RV 9.107.23 keeps nourishment, strength, and useful prosperity connected with the worship of ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः). The focus remains on the hymn's ritual and devotional setting.
Hindi Meaning
भाव की दृष्टि से “पवस्व वाजसातयेऽभि विश्वानि काव्या” के माध्यम से मित्र-वरुण से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। यहाँ संपदा को केवल वस्तु नहीं, बल्कि पोषण और क्षमता माना गया है।
Simple Explanation
RV 9.107.23 में ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) की स्तुति पोषण, शक्ति और उपयोगी संपन्नता को सामने लाती है। इसे यज्ञ और साधना, दोनों संदर्भों में पढ़ा जा सकता है।
RV 9.107.24
Mantra 24
स तू पवस्व परि पार्थिवं रजो दिव्या च सोम धर्मभिः । त्वां विप्रासो मतिभिर्विचक्षण शुभ्रं हिन्वन्ति धीतिभिः ॥२४॥
Meaning
Through “स तू पवस्व परि पार्थिवं रजो दिव्या च सोम धर्मभिः”, the seeker prays to Mitra-Varuna to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 9.107.24 should be read as part of Sukta 107's sequence. Its main emphasis is the link between outer ritual and inner attention, expressed through praise of ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः).
Hindi Meaning
“स तू पवस्व परि पार्थिवं रजो दिव्या च सोम धर्मभिः” के माध्यम से मित्र-वरुण से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। भाव केवल बाहरी क्रिया तक सीमित नहीं रहता; भीतर की जागरूकता भी साथ आती है।
Simple Explanation
RV 9.107.24 का भाव बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध पर टिका है। ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) का आह्वान यहाँ केवल नाम-स्मरण नहीं, बल्कि सजग प्रार्थना का रूप लेता है।
RV 9.107.25
Mantra 25
पवमाना असृक्षत पवित्रमति धारया । मरुत्वन्तो मत्सरा इन्द्रिया हया मेधामभि प्रयांसि च ॥२५॥
Meaning
In “पवमाना असृक्षत पवित्रमति धारया”, the seeker prays to Mitra-Varuna to awaken balanced strength and auspicious inspiration in the seeker’s life. Indra represents inner strength, courage, and victory over obstruction.
Study Note
In RV 9.107.25, sacred speech, offering, and courage, strength, and the removal of obstruction stay together. This keeps the reading grounded in the verse and in the praise of ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः).
Hindi Meaning
इस मंत्र में “पवमाना असृक्षत पवित्रमति धारया” के माध्यम से मित्र-वरुण से साधक के जीवन में शुभ प्रेरणा और संतुलित शक्ति जगाने की प्रार्थना है। यहाँ इन्द्र आंतरिक बल, साहस और अवरोध-विजय के प्रतीक हैं।
Simple Explanation
RV 9.107.25 में ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) की ओर उठी वाणी साहस, बल और अवरोध-विजय को आहुति के साथ समझने में मदद करती है। इसी से मंत्र का भाव स्थिर रहता है।
RV 9.107.26
Mantra 26
अपो वसानः परि कोशमर्षतीन्दुर्हियानः सोतृभिः । जनयञ्ज्योतिर्मन्दना अवीवशद्गाः कृण्वानो न निर्णिजम् ॥२६॥
Meaning
With “अपो वसानः परि कोशमर्षतीन्दुर्हियानः सोतृभिः”, the seeker prays to Mitra-Varuna to give protection, auspiciousness, and well-being. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 9.107.26 adds one step to the Sukta's movement, keeping the link between outer ritual and inner attention tied to yajna and the invoked presence of ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः).
Hindi Meaning
यहाँ “अपो वसानः परि कोशमर्षतीन्दुर्हियानः सोतृभिः” के माध्यम से मित्र-वरुण से रक्षा, शुभता और स्वस्ति देने की प्रार्थना है। मंत्र बाहरी अर्पण और भीतर की जागृति को साथ-साथ रखता है।
Simple Explanation
RV 9.107.26 सूक्त की गति में एक और चरण जोड़ता है, जहाँ बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध ऋषयः - सप्तर्षयः (भरद्वाजो बार्हस्पत्यः कश्यपो मारीचः गोतमो राहूगणः भौमोऽत्रिः विश्वामित्रो गाथिनः जमदग्निर्भार्गवः मैत्रावरुणिर्वासिष्ठः) के यज्ञ-संस्कार के साथ जुड़ा रहता है।
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