Rigveda Sukta
Rigveda Mandala 5 Sukta 44

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About RV 5.44
This Sukta has 15 mantras attributed to | translator = and addressed to काश्यपोऽवत्सारः (१० क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः, ११ विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः, १२ अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः, १३ सुतंभरश्च). The page keeps the Sanskrit text source-reviewed, then presents original study notes separately so the mantra text and the explanatory layer remain easy to distinguish.
Quick Facts
Original Study Translation
Study Meaning
This Vishvedevas Sukta uses signs of sky, earth, Agni, and other divine powers to show the wideness of life. Divine connection is read as a whole way of living, not a single moment of ritual.
Original Study Translation
Hindi Bhavarth
यह विश्वेदेव सूक्त आकाश, पृथ्वी, अग्नि और अन्य देव संकेतों से जीवन की व्यापकता दिखाता है। साधक इसमें देव-संबंध को केवल एक क्षण का कर्म नहीं, बल्कि पूरे जीवन की व्यवस्था मानता है।
RV 5.44.1
Mantra 1
तं प्रत्नथा पूर्वथा विश्वथेमथा ज्येष्ठतातिं बर्हिषदं स्वर्विदम् । प्रतीचीनं वृजनं दोहसे गिराशुं जयन्तमनु यासु वर्धसे ॥१॥
Meaning
Here, through “तं प्रत्नथा पूर्वथा विश्वथेमथा ज्येष्ठतातिं बर्हिषदं स्वर्विदम्”, the seeker prays to the Vishvedevas to receive the hymn and make sacred speech effective. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 5.44.1 keeps the link between outer ritual and inner attention connected with the worship of काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च). The focus remains on the hymn's ritual and devotional setting.
Hindi Meaning
पाठ के क्रम में “तं प्रत्नथा पूर्वथा विश्वथेमथा ज्येष्ठतातिं बर्हिषदं स्वर्विदम्” के माध्यम से विश्वेदेव से स्तुति-वाणी को स्वीकार कर उसे प्रभावशाली बनाने की प्रार्थना है। इसमें बाहरी विधि और भीतर की सजगता, दोनों जुड़े हैं।
Simple Explanation
RV 5.44.1 में काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च) की स्तुति बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध को सामने लाती है। इसे यज्ञ और साधना, दोनों संदर्भों में पढ़ा जा सकता है।
RV 5.44.2
Mantra 2
श्रिये सुदृशीरुपरस्य याः स्वर्विरोचमानः ककुभामचोदते । सुगोपा असि न दभाय सुक्रतो परो मायाभिरृत आस नाम ते ॥२॥
Meaning
Read in context, through “श्रिये सुदृशीरुपरस्य याः स्वर्विरोचमानः ककुभामचोदते”, the seeker prays to the Vishvedevas to grant nourishment, strength, insight, and useful prosperity. Prosperity is understood here as nourishment, capacity, and meaningful support.
Study Note
RV 5.44.2 should be read as part of Sukta 44's sequence. Its main emphasis is nourishment, strength, and useful prosperity, expressed through praise of काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च).
Hindi Meaning
भाव की दृष्टि से “श्रिये सुदृशीरुपरस्य याः स्वर्विरोचमानः ककुभामचोदते” के माध्यम से विश्वेदेव से रयि, वाज, बुद्धि और जीवनोपयोगी संपदा प्रदान करने की प्रार्थना है। यहाँ संपदा को केवल वस्तु नहीं, बल्कि पोषण और क्षमता माना गया है।
Simple Explanation
RV 5.44.2 का भाव पोषण, शक्ति और उपयोगी संपन्नता पर टिका है। काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च) का आह्वान यहाँ केवल नाम-स्मरण नहीं, बल्कि सजग प्रार्थना का रूप लेता है।
RV 5.44.3
Mantra 3
अत्यं हविः सचते सच्च धातु चारिष्टगातुः स होता सहोभरिः । प्रसर्स्राणो अनु बर्हिर्वृषा शिशुर्मध्ये युवाजरो विस्रुहा हितः ॥३॥
Meaning
Through “अत्यं हविः सचते सच्च धातु चारिष्टगातुः स होता सहोभरिः”, the seeker prays to the Vishvedevas to hear the seeker’s call and come near. Prosperity is understood here as nourishment, capacity, and meaningful support.
Study Note
In RV 5.44.3, sacred speech, offering, and nourishment, strength, and useful prosperity stay together. This keeps the reading grounded in the verse and in the praise of काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च).
Hindi Meaning
“अत्यं हविः सचते सच्च धातु चारिष्टगातुः स होता सहोभरिः” के माध्यम से विश्वेदेव से साधक की पुकार सुनकर निकट आने की प्रार्थना है। यहाँ संपदा को केवल वस्तु नहीं, बल्कि पोषण और क्षमता माना गया है।
Simple Explanation
RV 5.44.3 में काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च) की ओर उठी वाणी पोषण, शक्ति और उपयोगी संपन्नता को आहुति के साथ समझने में मदद करती है। इसी से मंत्र का भाव स्थिर रहता है।
RV 5.44.4
Mantra 4
प्र व एते सुयुजो यामन्निष्टये नीचीरमुष्मै यम्य ऋतावृधः । सुयन्तुभिः सर्वशासैरभीशुभिः क्रिविर्नामानि प्रवणे मुषायति ॥४॥
Meaning
In “प्र व एते सुयुजो यामन्निष्टये नीचीरमुष्मै यम्य ऋतावृधः”, the seeker prays to the Vishvedevas to illumine intelligence, right order, and disciplined action. The emphasis here is truth, discipline, and life aligned with rita.
Study Note
RV 5.44.4 adds one step to the Sukta's movement, keeping rita, truth, and disciplined order tied to yajna and the invoked presence of काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च).
Hindi Meaning
इस मंत्र में “प्र व एते सुयुजो यामन्निष्टये नीचीरमुष्मै यम्य ऋतावृधः” के माध्यम से विश्वेदेव से बुद्धि, ऋत और सही कर्म-शक्ति को प्रकाशित करने की प्रार्थना है। यहाँ सत्य, नियम और ऋत-आधारित जीवन पर बल है।
Simple Explanation
RV 5.44.4 सूक्त की गति में एक और चरण जोड़ता है, जहाँ ऋत, सत्य और अनुशासित व्यवस्था काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च) के यज्ञ-संस्कार के साथ जुड़ा रहता है।
RV 5.44.5
Mantra 5
संजर्भुराणस्तरुभिः सुतेगृभं वयाकिनं चित्तगर्भासु सुस्वरुः । धारवाकेष्वृजुगाथ शोभसे वर्धस्व पत्नीरभि जीवो अध्वरे ॥५॥
Meaning
With “संजर्भुराणस्तरुभिः सुतेगृभं वयाकिनं चित्तगर्भासु सुस्वरुः”, the seeker prays to the Vishvedevas to order the yajna, the offering, and the connection with the devas. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 5.44.5 is simple but layered: it speaks as prayer to काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च), ritual utterance, and reflection on the link between outer ritual and inner attention.
Hindi Meaning
यहाँ “संजर्भुराणस्तरुभिः सुतेगृभं वयाकिनं चित्तगर्भासु सुस्वरुः” के माध्यम से विश्वेदेव से यज्ञ, आहुति और देव-संबंध को व्यवस्थित करने की प्रार्थना है। इस पाठ में कर्म और चेतना, दोनों का संतुलन दिखाई देता है।
Simple Explanation
RV 5.44.5 में काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च) की स्तुति के भीतर अर्थ का केंद्र बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध है। इसलिए पाठक इसे कर्मकांड के साथ-साथ आंतरिक सजगता के संकेत के रूप में भी पढ़ सकता है।
RV 5.44.6
Mantra 6
यादृगेव ददृशे तादृगुच्यते सं छायया दधिरे सिध्रयाप्स्वा । महीमस्मभ्यमुरुषामुरु ज्रयो बृहत्सुवीरमनपच्युतं सहः ॥६॥
Meaning
Here, through “यादृगेव ददृशे तादृगुच्यते सं छायया दधिरे सिध्रयाप्स्वा”, the seeker prays to the Vishvedevas to awaken balanced strength and auspicious inspiration in the seeker’s life. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 5.44.6 keeps the link between outer ritual and inner attention connected with the worship of काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च). The focus remains on the hymn's ritual and devotional setting.
Hindi Meaning
पाठ के क्रम में “यादृगेव ददृशे तादृगुच्यते सं छायया दधिरे सिध्रयाप्स्वा” के माध्यम से विश्वेदेव से साधक के जीवन में शुभ प्रेरणा और संतुलित शक्ति जगाने की प्रार्थना है। इसमें बाहरी विधि और भीतर की सजगता, दोनों जुड़े हैं।
Simple Explanation
RV 5.44.6 में काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च) की स्तुति बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध को सामने लाती है। इसे यज्ञ और साधना, दोनों संदर्भों में पढ़ा जा सकता है।
RV 5.44.7
Mantra 7
वेत्यग्रुर्जनिवान्वा अति स्पृधः समर्यता मनसा सूर्यः कविः । घ्रंसं रक्षन्तं परि विश्वतो गयमस्माकं शर्म वनवत्स्वावसुः ॥७॥
Meaning
Read in context, through “वेत्यग्रुर्जनिवान्वा अति स्पृधः समर्यता मनसा सूर्यः कविः”, the seeker prays to the Vishvedevas to grant nourishment, strength, insight, and useful prosperity. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 5.44.7 should be read as part of Sukta 44's sequence. Its main emphasis is nourishment, strength, and useful prosperity, expressed through praise of काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च).
Hindi Meaning
भाव की दृष्टि से “वेत्यग्रुर्जनिवान्वा अति स्पृधः समर्यता मनसा सूर्यः कविः” के माध्यम से विश्वेदेव से रयि, वाज, बुद्धि और जीवनोपयोगी संपदा प्रदान करने की प्रार्थना है। भाव केवल बाहरी क्रिया तक सीमित नहीं रहता; भीतर की जागरूकता भी साथ आती है।
Simple Explanation
RV 5.44.7 का भाव पोषण, शक्ति और उपयोगी संपन्नता पर टिका है। काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च) का आह्वान यहाँ केवल नाम-स्मरण नहीं, बल्कि सजग प्रार्थना का रूप लेता है।
RV 5.44.8
Mantra 8
ज्यायांसमस्य यतुनस्य केतुन ऋषिस्वरं चरति यासु नाम ते । यादृश्मिन्धायि तमपस्यया विदद्य उ स्वयं वहते सो अरं करत् ॥८॥
Meaning
Through “ज्यायांसमस्य यतुनस्य केतुन ऋषिस्वरं चरति यासु नाम ते”, the seeker prays to the Vishvedevas to illumine intelligence, right order, and disciplined action. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
In RV 5.44.8, sacred speech, offering, and the link between outer ritual and inner attention stay together. This keeps the reading grounded in the verse and in the praise of काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च).
Hindi Meaning
“ज्यायांसमस्य यतुनस्य केतुन ऋषिस्वरं चरति यासु नाम ते” के माध्यम से विश्वेदेव से बुद्धि, ऋत और सही कर्म-शक्ति को प्रकाशित करने की प्रार्थना है। यहाँ यज्ञ की बाहरी रचना के साथ अंतर्मन की सावधानी भी महत्व रखती है।
Simple Explanation
RV 5.44.8 में काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च) की ओर उठी वाणी बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध को आहुति के साथ समझने में मदद करती है। इसी से मंत्र का भाव स्थिर रहता है।
RV 5.44.9
Mantra 9
समुद्रमासामव तस्थे अग्रिमा न रिष्यति सवनं यस्मिन्नायता । अत्रा न हार्दि क्रवणस्य रेजते यत्रा मतिर्विद्यते पूतबन्धनी ॥९॥
Meaning
In “समुद्रमासामव तस्थे अग्रिमा न रिष्यति सवनं यस्मिन्नायता”, the seeker prays to the Vishvedevas to grant nourishment, strength, insight, and useful prosperity. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 5.44.9 adds one step to the Sukta's movement, keeping nourishment, strength, and useful prosperity tied to yajna and the invoked presence of काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च).
Hindi Meaning
इस मंत्र में “समुद्रमासामव तस्थे अग्रिमा न रिष्यति सवनं यस्मिन्नायता” के माध्यम से विश्वेदेव से रयि, वाज, बुद्धि और जीवनोपयोगी संपदा प्रदान करने की प्रार्थना है। मंत्र बाहरी अर्पण और भीतर की जागृति को साथ-साथ रखता है।
Simple Explanation
RV 5.44.9 सूक्त की गति में एक और चरण जोड़ता है, जहाँ पोषण, शक्ति और उपयोगी संपन्नता काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च) के यज्ञ-संस्कार के साथ जुड़ा रहता है।
RV 5.44.10
Mantra 10
स हि क्षत्रस्य मनसस्य चित्तिभिरेवावदस्य यजतस्य सध्रेः । अवत्सारस्य स्पृणवाम रण्वभिः शविष्ठं वाजं विदुषा चिदर्ध्यम् ॥१०॥
Meaning
With “स हि क्षत्रस्य मनसस्य चित्तिभिरेवावदस्य यजतस्य सध्रेः”, the seeker prays to the Vishvedevas to grant nourishment, strength, insight, and useful prosperity. Prosperity is understood here as nourishment, capacity, and meaningful support.
Study Note
RV 5.44.10 is simple but layered: it speaks as prayer to काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च), ritual utterance, and reflection on nourishment, strength, and useful prosperity.
Hindi Meaning
यहाँ “स हि क्षत्रस्य मनसस्य चित्तिभिरेवावदस्य यजतस्य सध्रेः” के माध्यम से विश्वेदेव से रयि, वाज, बुद्धि और जीवनोपयोगी संपदा प्रदान करने की प्रार्थना है। यहाँ संपदा को केवल वस्तु नहीं, बल्कि पोषण और क्षमता माना गया है।
Simple Explanation
RV 5.44.10 में काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च) की स्तुति के भीतर अर्थ का केंद्र पोषण, शक्ति और उपयोगी संपन्नता है। इसलिए पाठक इसे कर्मकांड के साथ-साथ आंतरिक सजगता के संकेत के रूप में भी पढ़ सकता है।
RV 5.44.11
Mantra 11
श्येन आसामदितिः कक्ष्यो मदो विश्ववारस्य यजतस्य मायिनः । समन्यमन्यमर्थयन्त्येतवे विदुर्विषाणं परिपानमन्ति ते ॥११॥
Meaning
Here, through “श्येन आसामदितिः कक्ष्यो मदो विश्ववारस्य यजतस्य मायिनः”, the seeker prays to the Vishvedevas to awaken balanced strength and auspicious inspiration in the seeker’s life. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 5.44.11 keeps the link between outer ritual and inner attention connected with the worship of विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः. The focus remains on the hymn's ritual and devotional setting.
Hindi Meaning
पाठ के क्रम में “श्येन आसामदितिः कक्ष्यो मदो विश्ववारस्य यजतस्य मायिनः” के माध्यम से विश्वेदेव से साधक के जीवन में शुभ प्रेरणा और संतुलित शक्ति जगाने की प्रार्थना है। इसमें बाहरी विधि और भीतर की सजगता, दोनों जुड़े हैं।
Simple Explanation
RV 5.44.11 में विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः की स्तुति बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध को सामने लाती है। इसे यज्ञ और साधना, दोनों संदर्भों में पढ़ा जा सकता है।
RV 5.44.12
Mantra 12
सदापृणो यजतो वि द्विषो वधीद्बाहुवृक्तः श्रुतवित्तर्यो वः सचा । उभा स वरा प्रत्येति भाति च यदीं गणं भजते सुप्रयावभिः ॥१२॥
Meaning
Read in context, through “सदापृणो यजतो वि द्विषो वधीद्बाहुवृक्तः श्रुतवित्तर्यो वः सचा”, the seeker prays to the Vishvedevas to awaken balanced strength and auspicious inspiration in the seeker’s life. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 5.44.12 should be read as part of Sukta 44's sequence. Its main emphasis is the link between outer ritual and inner attention, expressed through praise of अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः.
Hindi Meaning
भाव की दृष्टि से “सदापृणो यजतो वि द्विषो वधीद्बाहुवृक्तः श्रुतवित्तर्यो वः सचा” के माध्यम से विश्वेदेव से साधक के जीवन में शुभ प्रेरणा और संतुलित शक्ति जगाने की प्रार्थना है। भाव केवल बाहरी क्रिया तक सीमित नहीं रहता; भीतर की जागरूकता भी साथ आती है।
Simple Explanation
RV 5.44.12 का भाव बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध पर टिका है। अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः का आह्वान यहाँ केवल नाम-स्मरण नहीं, बल्कि सजग प्रार्थना का रूप लेता है।
RV 5.44.13
Mantra 13
सुतम्भरो यजमानस्य सत्पतिर्विश्वासामूधः स धियामुदञ्चनः । भरद्धेनू रसवच्छिश्रिये पयोऽनुब्रुवाणो अध्येति न स्वपन् ॥१३॥
Meaning
Through “सुतम्भरो यजमानस्य सत्पतिर्विश्वासामूधः स धियामुदञ्चनः”, the seeker prays to the Vishvedevas to illumine intelligence, right order, and disciplined action. The emphasis here is knowledge, speech, and awakened discernment.
Study Note
In RV 5.44.13, sacred speech, offering, and clear thought, sacred speech, and discernment stay together. This keeps the reading grounded in the verse and in the praise of सुतंभरश्च).
Hindi Meaning
“सुतम्भरो यजमानस्य सत्पतिर्विश्वासामूधः स धियामुदञ्चनः” के माध्यम से विश्वेदेव से बुद्धि, ऋत और सही कर्म-शक्ति को प्रकाशित करने की प्रार्थना है। यहाँ ज्ञान, वाणी और विवेक का पक्ष मुख्य है।
Simple Explanation
RV 5.44.13 में सुतंभरश्च) की ओर उठी वाणी स्पष्ट बुद्धि, पवित्र वाणी और विवेक को आहुति के साथ समझने में मदद करती है। इसी से मंत्र का भाव स्थिर रहता है।
RV 5.44.14
Mantra 14
यो जागार तमृचः कामयन्ते यो जागार तमु सामानि यन्ति । यो जागार तमयं सोम आह तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः ॥१४॥
Meaning
In “यो जागार तमृचः कामयन्ते यो जागार तमु सामानि यन्ति”, the seeker prays to the Vishvedevas to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. The prayer points to inner awakening as well as outer ritual action.
Study Note
RV 5.44.14 adds one step to the Sukta's movement, keeping the link between outer ritual and inner attention tied to yajna and the invoked presence of काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च).
Hindi Meaning
इस मंत्र में “यो जागार तमृचः कामयन्ते यो जागार तमु सामानि यन्ति” के माध्यम से विश्वेदेव से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। मंत्र बाहरी अर्पण और भीतर की जागृति को साथ-साथ रखता है।
Simple Explanation
RV 5.44.14 सूक्त की गति में एक और चरण जोड़ता है, जहाँ बाहरी यज्ञ-विधि और भीतर की सजगता का संबंध काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च) के यज्ञ-संस्कार के साथ जुड़ा रहता है।
RV 5.44.15
Mantra 15
अग्निर्जागार तमृचः कामयन्तेऽग्निर्जागार तमु सामानि यन्ति । अग्निर्जागार तमयं सोम आह तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः ॥१५॥
Meaning
With “अग्निर्जागार तमृचः कामयन्तेऽग्निर्जागार तमु सामानि यन्ति”, the seeker prays to the Vishvedevas to accept the Soma or honey-like joy and awaken fresh energy within the seeker. Agni is understood here as the bridge between the seeker and the devas.
Study Note
RV 5.44.15 is simple but layered: it speaks as prayer to काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च), ritual utterance, and reflection on the movement between offering and divine response.
Hindi Meaning
यहाँ “अग्निर्जागार तमृचः कामयन्तेऽग्निर्जागार तमु सामानि यन्ति” के माध्यम से विश्वेदेव से सोम/मधु रूप आनंद को स्वीकार कर साधक के भीतर नई ऊर्जा जगाने की प्रार्थना है। यहाँ अग्नि साधक और देवता के बीच सेतु की तरह समझी गई है।
Simple Explanation
RV 5.44.15 में काश्यपोऽवत्सारः (क्षत्र-मनस-एवावद-यजत-सध्रि-अवत्साराः विश्ववार - यजत-मायी - अवत्साराः अवत्सारेण सह सदापृण-यजत-बाहुवृक्त-श्रुतवित्- तर्याः सुतंभरश्च) की स्तुति के भीतर अर्थ का केंद्र आहुति और देव-संबंध के बीच की गति है। इसलिए पाठक इसे कर्मकांड के साथ-साथ आंतरिक सजगता के संकेत के रूप में भी पढ़ सकता है।
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What is RV 5.44?
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